मंजिले अब भी दूर ही सही,
चलने के लिये राह तो दिख रही है…
अंधेरों मे कट रहा है सफर अब तक भलेही,
दूर से झलकती रोशनी की फुहार तो दिख रही है…
तपकर धूप मे जल चुकी ही सही,
सुनहरे उम्मीद की किनार तो दिख रही है…
महीनों से बंजर पडी है सही,
अबकि बारिश से जिंदगी की उभार तो दिख रही है…
तबाह हो चुकी सी ये कायनात ही सही,
नयी शुरुवात की आह तो दिख रही है…
सालो से ये आवाज दबी हुई सी ही सही,
फिर दट के खडे रहने की चाह तो दिख रही है…
– सौरभ
Category: कविता
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यूं बेसब्री को लिये तू चल रहा है कितना,
रुक जा रहा सास लेने को लम्हा…
यूं ख्वाहिशोको बुनता जाएगा कितना,
रुक जा रहा बांध लेने को लम्हा…
यूं भागेगा कब तक दुसरोको पिछे,
रुक जा रहा अपना जिने को लम्हा…
यूं जिंदा होके भी मुर्दे सा तू क्यूँ है,
रुक जा रहा जागने को ये लम्हा…
यूँ सोचता सब के बारे मे क्यूँ है,
रुक जा रहा खुद को देने ये लम्हा…
– सौरभ -

जसे पावसाला गणगोत नाही
बेधुंद घनघोर बरसत तो राही
तसे या मनाला उधळून द्यावे
नव्याने पुन्हा रोज प्रेमा पडावे…जसे थेंब अंगावरी हे फवारे
भिडे गारवा अंगी उठती शहारे
तसे या मनाला पसरूनी द्यावे
नव्याने पुन्हा रोज प्रेमा पडावे…जशी दरवळे माती ओली सुंगधी
आनंदात या सर्व रमे आत्मरंगी
तसे या मनाला सुगंधी करावे
नव्याने पुन्हा रोज प्रेमा पडावे…जसे तृप्त होती ही धरती शिवारे
पिसारे फुलवून मोर स्वच्छंद नाचे
तसे मनाला मोकळे त्या करावे
नव्याने पुन्हा रोज प्रेमा पडावे….– सौरभ