चाह तो दिख रही है…

मंजिले अब भी दूर ही सही,
चलने के लिये राह तो दिख रही है…
अंधेरों मे कट रहा है सफर अब तक भलेही,
दूर से झलकती रोशनी की फुहार तो दिख रही है…
तपकर धूप मे जल चुकी ही सही,
सुनहरे उम्मीद की किनार तो दिख रही है…
महीनों से बंजर पडी है सही,
अबकि बारिश से जिंदगी की उभार तो दिख रही है…
तबाह हो चुकी सी ये कायनात ही सही,
नयी शुरुवात की आह तो दिख रही है…
सालो से ये आवाज दबी हुई सी ही सही,
फिर दट के खडे रहने की चाह तो दिख रही है…
– सौरभ


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